नीरज बहल नव हिन्दुस्तान पत्रिका।
– अखिलेश ने किया ट्वीट, बोले स्वास्थ्य विभाग देखने वाला कोई नहीं
– कांग्रेस ने कहा डबल इंजन की सरकार ने डबल बीमार बनाया
– प्राचार्य डा0 संजय काला ने विभागध्यक्ष के बयान का किया खण्डन
कानपुर। 14 बच्चों को संक्रमित खून चढ़ाने के मामले में यूपी में सियासत गरमाने लगी है। बुधवार के सुबह कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने यूपी की स्वास्थ्य सेवाओं पर निशाना सधाते हुए ट्विटर पर पोस्ट कर भाजपा सरकार को गिरा है कहां है की डबल इंजन की सरकार ने हमारे स्वास्थ्य व्यवस्था को डबल बीमार कर दिया है। कानपुर में में थैलेसीमिया से पीडित 14 बच्चों को संक्रमित खून चढ़ा दिया गया जिसका पता स्क्रिनिंग में हुआ। इन बच्चों को एचआईवी एड्स और हेपेटाइटिस बी व सी जैसी चिंताजनक बीमारियां हो गई है यह गंभीर लापरवाही शर्मनाक है। सरकारी लापरवाही की सजा इन मासूम बच्चों को भुगतनी पड़ रही है जो पहले से ही एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। वही अखिलेश यादव ने ट्वीट कर कहा है कि मामले की जांच कर कार्रवाई हो।
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिलें में संक्रमित खून चढ़ने से 14 बच्चों को एचआईवी और हेपेटाइटिस का संक्रमण हो गया। जिस पर बाल रेाग विभागध्यक्ष ने मीडिया को गलत बयानबाजी कर उलझाने का काम कर दिया जिसको लेकर प्राचार्य डा0 संजय काला ने एक प्रेसवार्ता कर विभागध्यक्ष डा0 अरूण आर्या के बयान को अनाधिकृत और गलत बताते हुए उसका खण्डन किया। उन्होंने पत्रकारो से कहा कि डा0 अरूण आर्या पर शासन ही कार्यवाही कर सकता है ,लेकिन विभागीय कार्यवाही जरूर की जाएगी।
तीन से चार हफ्ते में मरीजों को खून की पड़ती है जरूर
थैलेसीमिया से पीड़ित मरीजों को हर 3 से 4 हफ्ते के बीच ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ती है ऐसे में कभी-कभी मरीज अपनी सुविधा के अनुसार जो अस्पताल घर के पास हुआ वहां से खून चढ़ा लेते हैं उसे समय तो मरीज को नहीं पता चलता है लेकिन बाद में जब संक्रमण फैल चुका होता है तब मरीज को इसकी जानकारी होती है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है
हर तीन से चार माह में होती है स्क्रीनिंग
इस मामले को लेकर जीएसबीएम मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर संजय काला ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि मेडिकल कॉलेज में एक भी बच्चे को ब्लड ट्रांसफ्यूजन नहीं किया गया है मेडिकल कॉलेज द्वारा महेश स्क्रीनिंग की गई है बाल रोग के विभाग अध्यक्ष डॉक्टर अरुण कुमार आर्य ने बताया है की थैली सीमा से पीड़ित मरीजों की स्क्रीनिंग हर 3 से 4 महीने के बीच में की जाती है स्क्रीनिंग में देखा जाता है कि उन मरीजों कितना सुधार हो रहा है या फिर कोई अन्य बीमारी तो नहीं अटैक कर रही है इस स्कैनिंग में 14 लोगों में
अलग-अलग सेंट्ररो में चढ़ाया गया खून
इन सभी मरीजों को अलग-अलग सेंटरों पर खून चढ़ाया गया था। कोरोना कल के बाद थैलेसीमिया मरीजों की संख्या बढ़ी है। डा0 आर्या के मुताबिक कोरोना काल के बाद से अस्पताल में थैलेसीमिया मरीजों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। पहले 40 से 45 थैलेसीमिया के मरीज आते थे, लेकिन अब मरीजो की संख्या काफी बढ़ गई है क्योंकि लोग लखनऊ या अन्य सेंटर पर ना जाकर कानपुर मेडिकल कॉलेज आ रहे हैं इन दिनों यहां करीब 180 मरीज आए है। यहां पर वर्ल्ड क्लास नायक मशीन के माध्यम से ब्लड ट्रांसफ्यूजन किया जाता है।
थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रोग है इस रोग होने पर मरीज को खून नहीं बन पाता है उनमें से लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या बहुत कम होती है यह रोक माता-पिता के जिन की गड़बड़ी होने के कारण बच्चों में रहता है खून न बनने के कारण मरीज को हर 3 से 4 हफ्ते में एक बार खून चढ़ाना पड़ता है।




