उन्नाव।नारी का सम्मान जहां है, संस्कृति का उत्थान वहां है।जिस मन में नारी आदर है, निश्चित ही भगवान वहां है
युग निर्माता, भाग्य विधाता, त्यागी, बलिदानी नारी।
ममता, दया, प्रेम की मूरत, जीवन शैली है न्यारी।।
रूप अनेकों हैं नारी के, हर रूप यही दर्शाता है।
सम्बन्धों पर लहू सींचकर, मन इसका इतराता है।।
हृदय पुष्प से कोमल इसका, स्वयं दुखों को सहती है।
सामाजिक उत्थान वास्ते पल पल चिंतित रहती है।।
माता, बहन, पुत्री, पत्नी नारी के सम्बोधन हैं।
निश्छल, निर्मल काया इसकी, मानो जैसे दर्पण हैं।।
जग जननी के गीत सुनाता, हर मज़हब सर्वग्य यहां।
शीश झुकाकर इन चरणों में, “रज़ा” हुआ कृतज्ञ यहां।




