रोजा हमें अच्छा इंसान बनाने के साथ ही सब्र और संयम भी सिखाता है’ मौलाना जियाउल हक चिश्ती

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उन्नाव।माहे रमजान की फजीलत बयान करते हुए नगर के मोहल्ला गुलाम मुस्तफा (गोल कुआं) की हुसैनी मस्जिद के पेश इमाम मौलाना जियाउल हक चिश्ती ने कहा कि रोजा इंसान के भीतर इंसानियत जगाने का एक बेहतरीन माध्यम है। उन्होंने कहा कि अल्लाह ने रोजा सिर्फ इसलिए फर्ज नहीं किया कि इंसान फाकाकशी (भूख) का अनुभव करे, बल्कि इसका असली मकसद इंसान के भीतर ‘तक़वा’ (परहेजगारी) पैदा करना है।
​ मौलाना ने कहा कि कड़ी धूप और प्यास के बावजूद जब एक रोजेदार खाने-पीने से दूर रहता है, तो वह असल में अपने नफ्स (मन) पर काबू पाना सीखता है। यही संयम उसे साल के बाकी महीनों में भी बुराइयों से बचने की ताकत देता है। रोजा रखने से जब इंसान खुद भूख और प्यास महसूस करता है, तब उसे समाज के गरीब और बेसहारा तबके के दर्द का अहसास होता है। यह अहसास उसे एक बेहतर और मददगार इंसान बनाता है। मौलाना चिश्ती ने जोर देकर कहा कि अगर रोजा रखकर भी इंसान झूठ, गीबत (पीठ पीछे बुराई) और नफरत से दूर नहीं रहता, तो उसका रोजा महज एक उपवास बनकर रह जाता है। सच्चा रोजेदार वही है जिसकी जुबान, आंख और हाथ भी रोजे में हों। “रोजा वह ढाल है जो इंसान को न केवल गुनाहों से बचाती है, बल्कि उसके भीतर सहनशीलता और दूसरे के प्रति सम्मान का भाव भी पैदा करती है।”​ उन्होंने अपील की कि इस पवित्र महीने में इबादत के साथ-साथ खिदमत-ए-खल्क (मानवता की सेवा) पर ध्यान दें। अपने पड़ोसियों का ख्याल रखें और इफ्तार में गरीबों को शामिल करें। यही रमजान की असल रूह और इस्लाम की सच्ची सीख है।


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