उन्नाव।चंद्रशेखर आजाद पक्षी अभयारण्य में सफल कार्यशाला 28 फरवरी 2026: पर्यावरण संरक्षण और शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत, चंद्रशेखर आजाद पक्षी अभयारण्य, नवाबगंज में वन विभाग द्वारा भूगोल विभाग डी.एस.एन. (पी.जी.) कॉलेज, ऊन्नाव के सहयोग से प्रवासी पक्षियों के पैटर्न को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय कारकों तथा पक्षियों की गणना तकनीक पर एक फील्ड कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य छात्रों को सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना था, ताकि वे पर्यावरणीय मुद्दों को गहराई से समझ सकें और संरक्षण प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
चंद्रशेखर आजाद पक्षी अभयारण्य का इतिहास और महत्व काफी समृद्ध है। यह अभयारण्य वर्ष 1984 में स्थापित किया गया था और 2015 में स्वतंत्रता सेनानी शहीद चंद्रशेखर आजाद के नाम पर नामित किया गया। उन्नाव जिले में कानपुर-लखनऊ राजमार्ग पर स्थित यह क्षेत्र लगभग 224.6 हेक्टेयर में फैला हुआ है, जिसमें एक प्राकृतिक झील और उसके आसपास का पारिस्थितिक तंत्र शामिल है। उत्तरी भारत की प्रमुख आर्द्रभूमियों में शुमार यह अभयारण्य सीआईएस देशों (पूर्व सोवियत संघ) से आने वाले लगभग 250 प्रजातियों के प्रवासी पक्षियों को संरक्षण प्रदान करता है। इनमें ग्रेलैग गूज, पिनटेल, रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड, गैडवाल, सारस क्रेन और साइबेरियन क्रेन जैसी दुर्लभ प्रजातियां प्रमुख हैं। हालांकि 1990 के दशक से इन पक्षियों की संख्या में कमी दर्ज की गई है, जो मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन, मानवीय हस्तक्षेप और आर्द्रभूमियों के सिकुड़ने के कारण है। अभयारण्य में पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए हिरण पार्क, वॉचटावर और पक्षी अवलोकन केंद्र उपलब्ध हैं, जो इसे पर्यावरण शिक्षा का एक आदर्श स्थल बनाते हैं। वन विभाग द्वारा यहां नियमित रूप से संरक्षण गतिविधियां आयोजित की जाती हैं, जिनमें पक्षी गणना और आवास प्रबंधन शामिल हैं।
कार्यशाला सुबह 8 बजे से शायं 4 बजे तक चली, जिसमें पक्षियों की गणना सहित जलवायु कारकों (जैसे तापमान और वर्षा में परिवर्तन), आर्द्रभूमि जल विज्ञान (जल स्तर और गुणवत्ता), भोजन उपलब्धता (जलीय पौधे और कीड़े), पारिस्थितिक संतुलन आदि विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई। वन विभाग के विशेषज्ञों ने प्रवासी पक्षियों की गतिविधियों पर इन कारकों के प्रभाव की वैज्ञानिक व्याख्या की, जिसमें जलवायु परिवर्तन के कारण प्रवास मार्गों में बदलाव और आवास हानि जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला गया।
डी.एस.एन. कॉलेज के भूगोल विभाग के छात्रों ने इस कार्यशाला में सक्रिय रूप से भाग लिया। वे अभयारण्य के विभिन्न क्षेत्रों में फील्ड विजिट पर गए, जहां उन्होंने डेटा संग्रह की बुनियादी तकनीकों का अभ्यास किया। विशेष रूप से, छात्रों को पक्षी गणना की कौशल सिखाया गया, जो पर्यावरण निगरानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन तकनीकों में पॉइंट काउंट विधि शामिल है, जिसमें एक निश्चित स्थान पर खड़े होकर निर्धारित समय (जैसे 5-10 मिनट) में दिखने या सुनाई देने वाले पक्षियों की गिनती और पहचान की जाती है। दूसरी विधि लाइन ट्रांसेक्ट है, जिसमें एक सीधी रेखा (ट्रांसेक्ट) पर धीरे-धीरे चलते हुए आसपास के पक्षियों की गिनती की जाती है, जिसमें दूरी और दिशा का ध्यान रखा जाता है। बड़े झुंडों के लिए, छोटे-छोटे हिस्सों में गिनती करके समग्र अनुमान लगाने की तकनीक सिखाई गई, जो सांख्यिकीय सॉफ्टवेयर या सरल गणना से समर्थित होती है। छात्रों ने दूरबीन, जीपीएस डिवाइस और नोटबुक का उपयोग करके व्यावहारिक रूप से इन विधियों को सीखा, जिससे उन्हें पक्षियों की संख्या, प्रजाति विविधता और व्यवहार के बारे में वास्तविक डेटा एकत्र करने का अनुभव मिला। इस दौरान, उन्होंने पर्पल हेरान और रेड पोचर्ड जैसे पक्षियों को करीब से अवलोकन किया।
डी.एस.एन. कॉलेज के भूगोल विभाग के प्रमुख डॉ. अनिल साहू ने कार्यशाला पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह कार्यशाला छात्रों के लिए एक अनमोल अवसर साबित हुई, जहां उन्होंने कक्षा में पढ़ाए जाने वाले सैद्धांतिक ज्ञान को व्यावहारिक रूप से सीखा । प्रवासी पक्षियों के पैटर्न पर जलवायु परिवर्तन, आर्द्रभूमियों की गिरावट और मानवीय गतिविधियों का प्रभाव समझना पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है। पक्षी गणना की तकनीकों को सीख कर छात्र अब स्वयं संरक्षण सर्वेक्षणों में योगदान दे सकेंगे, जो उनके शैक्षणिक और व्यावसायिक विकास के लिए लाभकारी होगा। हम वन विभाग के साथ ऐसे सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक हैं, जो न केवल छात्रों में पर्यावरण जागरूकता बढ़ाए बल्कि स्थानीय समुदाय को भी संरक्षण प्रयासों से जोड़े।”
चंद्रशेखर आजाद पक्षी अभयारण्य के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर विवेक सिंह ने बताया , “यह कार्यशाला अभयारण्य की जैव विविधता को समझने और संरक्षण के प्रयासों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित की गई थी। उन्होंने बताया हम शैक्षणिक संस्थानों के साथ ऐसे कार्यक्रमों को जारी रखेंगे, ताकि युवा पीढ़ी पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाए और आर्द्रभूमियों की रक्षा के लिए जागरूक बने।”
पक्षी अभ्यारण्य के अधिकारियों ने बताया कि कार्यशाला में 30 छात्रों और संकाय सदस्यों ने भाग लिया, जिनमें स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के छात्र शामिल थे। यह कार्यक्रम पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ, विशेषकर ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर जैव विविधता हानि एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। आगे भी वन विभाग द्वारा ऐसे फील्ड आधारित कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है, जिसमें अन्य कॉलेजों और स्थानीय समुदायों को शामिल किया जाएगा। इस प्रकार की पहल न केवल शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी विभागों के बीच सहयोग को मजबूत करती हैं, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में भी योगदान देगी। कार्यशाला में भूगोल विभाग की सहायक प्राध्यापिका डॉ. शैली गुप्ता, प्रयोगशाला सहायक अनुराग सिंह सम्मिलित हुए। भूगोल विभाग नें कार्यशाला में प्रतिभाग की अनुमति के लिए प्राचार्य डॉ. राजेश श्रीवास्तव को धन्यवाद ज्ञापित किया।
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