उन्नाव।सोमवार की दोपहर उन्नाव की राजनीति के लिए भारी पड़ गई। भारतीय जनता पार्टी के तीन बार सांसद रहे देवीबक्श सिंह ने कानपुर के एक निजी नर्सिंग होम में अंतिम सांस ली। 85 वर्षीय देवीबक्श सिंह बीते तीन दिनों से निमोनिया से जूझ रहे थे। दोपहर करीब 12 बजे जैसे ही उनके निधन की खबर फैली, उन्नाव की फिज़ा ग़मगीन हो गई।
शुक्लागंज–राजधानी मार्ग स्थित उनके आवास पर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा। कोई कार्यकर्ता था, कोई पुराना साथी, तो कोई ऐसा आम नागरिक—जिसके काम के लिए कभी उन्होंने सांसद बनकर नहीं, अपने आदमी बनकर आवाज़ उठाई थी। हर आंख नम थी।
जहां राजनीति पद नहीं, पहचान थी
देवीबक्श सिंह उन नेताओं में थे जिनकी राजनीति कुर्सी से नहीं, जमीन से निकली थी। बीघापुर ब्लॉक के करमी गढ़ेवा गांव से ग्राम प्रधान बने और वहीं से जनसेवा का जो सफर शुरू हुआ, वह सीधे संसद तक पहुंचा।
1991 से 1999 तक लगातार तीन बार उन्नाव की जनता ने उन्हें लोकसभा भेजा और जिले में उनकी अलग पहचान बनाई।
हालांकि राजनीति के उतार–चढ़ाव से वह भी अछूते नहीं रहे।
1999 में सपा प्रत्याशी दीपक कुमार और 2004 में बसपा के ब्रजेश पाठक से उन्हें हार मिली, लेकिन जनसंपर्क और सादगी की राजनीति उन्होंने कभी नहीं छोड़ी।
अटल जी के बेहद करीब, यादों में हमेशा
परिवार वालों के अनुसार, देवीबक्श सिंह का पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से विशेष स्नेह था। एक यादगार पल का जिक्र करते हुए बताया गया कि जब अटल जी शुक्लागंज आए थे, तो उन्होंने देवीबक्श सिंह को अपने साथ कानपुर के फूलबाग में आयोजित जनसभा के मंच पर स्थान दिया था।
लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ भी उनके मधुर संबंध रहे।
एक युग का अंत
देवीबक्श सिंह का जाना सिर्फ एक पूर्व सांसद का जाना नहीं है, बल्कि उन्नाव की राजनीति से एक ऐसे चेहरे का विदा होना है, जो सत्ता से ज्यादा संवाद में विश्वास करता था।
उनकी सादगी, पकड़ और जमीन से जुड़ा नेतृत्व आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल रहेगा।
उन्नाव की मिट्टी से संसद तक देवी बक्स सिंह की राजनीतिक कहानी
उन्नाव जनपद के बीघापुर तहसील के कर्मी गढ़ेवा गांव में 14 मई 1940 को जन्मे देवी बक्स सिंह की पहचान सिर्फ एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि उस साधारण किसान परिवार के बेटे के रूप में भी रही, जिसने मेहनत और संकल्प के बल पर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाई। खेती और व्यापार से जुड़ा यह परिवार जमीन से जुड़ी समस्याओं को भली-भांति समझता था—और यही समझ आगे चलकर उनकी राजनीति की पहचान बनी।
शिक्षा उन्होंने टेढ़ा इंटर कॉलेज, उन्नाव से मैट्रिक तक पूरी की। युवावस्था में ही सामाजिक सरोकारों के प्रति झुकाव बढ़ा और 1989 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। पार्टी से जुड़ने के कुछ ही समय बाद जनता का भरोसा उनके साथ जुड़ता चला गया।
1991 का आम चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उन्नाव लोकसभा क्षेत्र से जीत हासिल कर वे पहली बार संसद पहुंचे। इसके बाद 10वीं, 11वीं और 12वीं लोकसभा—लगातार तीन कार्यकाल (1991 से 1999) तक—उन्होंने उन्नाव का प्रतिनिधित्व किया। यह उपलब्धि क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ और जनता से जुड़े रहने की शैली का प्रमाण मानी जाती है।
संसद में रहते हुए देवी बक्स सिंह ने किसान, व्यापारी और ग्रामीण मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उनकी राजनीति का केंद्र विकास, बुनियादी सुविधाएं और स्थानीय समस्याएं रहीं। निजी जीवन में 1960 में कमला देवी सिंह से विवाह हुआ था।
आज भी उन्नाव के अभिलेखों और राजनीतिक स्मृतियों में देवी बक्स सिंह एक ऐसे जनप्रतिनिधि के रूप में याद किए जाएंगे, जिन्होंने गांव की मिट्टी से निकलकर संसद तक का सफर तय किया—और अपने क्षेत्र की आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।



