उन्नाव में उपभोक्ताओं की सहमति बिना जबरन लगाए जा रहे स्मार्ट मीटर,दूसरे राज्यों से तीन गुना महंगे मीटर, पुलिस का भय दिखाकर हो रही कार्रवाई

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उन्नाव। ज़िले में स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने को लेकर उपभोक्ताओं और बिजली विभाग के बीच विवाद गहराता जा रहा है।
उपभोक्ताओं का आरोप है कि विभागीय टीमें बिना लिखित अनुमति मीटर बदल रही हैं, और विरोध करने पर पुलिस का भय दिखाया जा रहा है।

विधुत अधिनियम 2003 की धारा 43 और 57(2) के तहत उपभोक्ता को अपने कनेक्शन व मीटर प्रकार चुनने का अधिकार प्राप्त है।
बिना सहमति मीटर बदलना और दबाव डालना सेवा में कमी की श्रेणी में आता है, जिस पर नियामक आयोग कार्रवाई कर सकता है।

विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि यह क्षेत्र “सक्सेस स्टोरी प्रोजेक्ट” के तहत चयनित है,
लेकिन सवाल यह है कि क्या नियामक आयोग ने ऐसा चयन वास्तव में अनुमोदित किया है?

गंगाघाट, शुक्लागंज और अन्य शहरी-ग्रामीण इलाकों में लोगों ने बताया कि टीमें कहती हैं —
“ऊपर से आदेश है, नहीं बदले तो पुलिस बुलाकर कार्रवाई होगी।” कनेक्शन काटने की धमकी दी जा रही है।
इस रवैये से लोगों में भय और नाराज़गी दोनों बढ़ रही है।

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अनुसार, उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटर की कीमत अन्य राज्यों से तीन गुना अधिक है।

राजस्थान ₹2,700, महाराष्ट्र ₹2,600, मध्य प्रदेश ₹2,400, जबकि यूपी में ₹6,016 (एक फेज) और ₹11,184 (तीन फेज)।
परिषद ने आरोप लगाया कि यह दरें बिना नियामक स्वीकृति के लागू की गई हैं।
“उन्नाव समेत पूरे प्रदेश में पुलिस के भय से मीटर लगवाना उपभोक्ता अधिकारों का हनन है।

कीमतों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए और अतिरिक्त वसूली लौटाई जाए।”
नियामक आयोग ने UPPCL से जवाब मांगा है कि दरें बिना मंज़ूरी कैसे तय हुईं और उपभोक्ता सहमति का क्या प्रमाण है।
कॉरपोरेशन ने सफाई दी है कि योजना केंद्र सरकार की RDSS स्कीम के तहत लागू है और लागत अधिक होने से दरें बढ़ी हैं।
उन्नाव में उपभोक्ताओं ने अब विरोध तेज कर दिया है। कई स्थानों पर लोगों ने विभागीय टीमों को रोककर लिखित नोटिस की मांग की। वही उपभोक्ताओं ने यह भी कहा कि उनके चालू विधुत मीटर को विभाग उखाड़ कर ले जा रहा है जिसके बदले में कोई कंपनसेशन भी नहीं दिया जा रहा जबकि पूर्व में लगे मीटर का पैसा विभाग द्वारा लिया जा चुका है

लोगों का कहना है “स्मार्ट मीटर सुविधा नहीं, सज़ा बन गए हैं।”

अब सबकी निगाहें नियामक आयोग के फैसले पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि राहत मिलेगी या विवाद और गहराएगा।

देखे वीडियो।


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