बांगरमऊ,उन्नाव।कल आप सभी ने राजा भर्तृहरि के सुंदर प्रसंग का दर्शन किया। गुरु मछन्दर नाथ जो कि वैराग्य शतक राजा भर्तृहरि से लिखवा रहे थे लेकिन राजा अपनी रानी पिंगला के प्रेम मै इतने व्याकुल की वैराग्य शतक छोड़ श्रृंगार शतक लिखने लगे। रानी के प्रेम मै दीवाने हो गए गुरु मछन्दर नाथ के शिष्य गुरु गोरखनाथ वो प्रण करके गय मै राजा को वापस लाऊंगा।राजा के राज्य में अश्वपाल का भेष बना के प्रवेश कर गए और उसी राज्य में एक ब्राह्मण रोज सूर्य नारायण को जल देते है।एक दिन सूर्य नारायण ने वो फल ब्राह्मण को दे दिया ब्राह्मण ने वही फल राजा को दे दिया। राजा ने रानी पिंगला को दिया पिंगला ने अश्वपाल को दूर करने के लिए वही फल अश्वपाल को दे दिया और अश्वपाल ने वही फल एक वैश्या को दिया वैश्या ने वो फल राजा को ला के दे दिया। यही से राजा का मन बदल गया और पिंगला को छोड़ कर के अपने गुरु के पास पहुंचे गुरु ने आदेश दिया पिंगला से मां बोल कर के भिक्षा मांग के लाओ। राजा ने मां कह कर के भिक्षा मांगी और वैराग्य शतक लिखने को चले गए। इस कुशल लीला का संचालन स्वामी नंदकिशोर के सानिध्य में सम्पन्न हुआ।
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