बांगरमऊ,उन्नाव ।श्री दुर्गेश्वर कृष्ण लीला समिति के तत्वाधान में चल रहे कृष्ण लीला महोत्सव में भगवान कृष्ण व उनके बाल सखा सुदामा की मित्रता की लीला में दर्शाया गया कि भगवान कृष्ण तो द्वारिकापुरी के राजा बन राज सुख पा रहे हैं। जबकि उनके मित्र सुदामा जी को अन्यान्य मुसीबतों को सामना करना पड़ रहा है, जिसमे उनके परिवार को दो जून का भोजन भी नहीं मिल पा रहा है। पूरा परिवार अत्यन्त गरीबी में जी रहा है।
लीला में दर्शाया गया जब बाल सखा कृष्ण सुदामा के साथ सांदीपनि ऋषि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उन्हीं दिनों एक नगर में एक बुढ़िया मां रहती थी वह भिक्षा मांग कर लाए हुए अन्न से अपना जीवन काट रही थी । एक दिन कही से चने मांग करके लाई जिसमे कुछ खा लिए बाकी बचे चने पोटली बंद कर के रख दिए। लेकिन चोर उस पोटली को उसी रात चुरा ले गए चोरी की गई वही पोटली चोरों ने संदीपन मुनि के आश्रम में छुपा दी । इधर मैया ने श्राप दे दिया कि जो इन चनों को खायेगा वह भी मेरी तरह गरीब हो जाएगा । इस बात से अवगत सुदामा जी ने जानबूझ कर चने खा लिए कि मित्र कृष्ण पर किसी तरह का कोई संकट न आने पाए । इसलिए सुदामा जी ने पहले मित्र धर्म को निभाया जिसके कारण उन्हें गरीबी में जीवन यापन करना पड़ा।
सुदामा ने श्री हरि का नाम जपना नहीं छोड़ा । कुछ समय बाद द्वारकाधीश भगवान ने संत भेष धारण कर सुदामा की कुटिया में जा कर उनकी पत्नी से कह गए आपके पति के मित्र कृष्ण द्वारिकापुरी के राजा द्वारकानाथ है। अपने पति को द्वारकाधीश के पास भेज देना । सुदामा की पत्नी ने पति के भिक्षा मांग कर वापस घर लौटने पर संत की बात अपने पति से कही। पत्नी के समझाने बुझाने के बाद सुदामा जी द्वारिका गए । वहां द्वारकाधीश भगवान ठाकुर जी ने बाल सखा सुदामा जी के चरणों को धोया और अपना भक्तवत्सल गरीब निवाज नाम सत्य कर दिया। सुदामा जी को 2 लोक की संपत्ति ठाकुर जी ने प्रदान की लेकिन सुदामा जी फिर भी कुटिया बना कर ही रहे और ठाकुर जी का भजन किया।
लीला का मंचन श्री नंदकिशोर जी की सानिध्यता में सम्पन्न हुआ।तबला पर कृष्णा शर्मा अपनी चांटी के द्वारा आनंद दिला रहे है उनके साथ भजन का आनन्द वेदांस शर्मा प्रदान कर रहे है।
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