उन्नाव। की पावन धरा पर, लगभग 153 वर्ष पूर्व, जब धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना अपने उत्कर्ष पर थी, तभी दोसर वैश्य समाज के श्रद्धेय मन्नी लाल शाह ने एक ऐतिहासिक परंपरा का सूत्रपात किया श्री रामलीला, जो आज साकेत धाम रामलीला के नाम से जिले में अपनी पहचान बनाने में सबसे आगे है और आदरपूर्वक जानी जाती है। अचलगंज तिराहे पर स्थित यह लीला-स्थली उस काल से ही धर्म, भक्ति और संस्कृति का जीवंत प्रतीक बनी हुई है।
प्रारंभ में यह रामलीला “बनियों की रामलीला” के नाम से प्रसिद्ध थी। समय बीता, परंपरा आगे बढ़ती रही। 1980 के दशक तक पहुँचते-पहुँचते इस रामलीला ने इतनी ख्याति अर्जित की कि कानपुर, लखनऊ, रायबरेली जैसे शहरों से भी लोग इस अनुपम आयोजन को देखने के लिए उन्नाव की ओर रुख करने लगे।
उस समय की एक विशेष बात यह थी कि बिहार के दरभंगा से एक समर्पित नाट्य मंडली रामलीला के मंचन हेतु आया करती थी। ये कलाकार रात को रामायण की जीवंत झलक दिखाते और दिन में प्रसिद्ध हिंदी फ़िल्मों पर आधारित नाटकों से दर्शकों का मनोरंजन करते। दुर्भाग्यवश, एक बार मंडली की एक महिला कलाकार के साथ हुए दुखद हादसे ने दरभंगा मंडली को उन्नाव आने से रोक दिया।
जब रामलीला की परंपरा मंद पड़ने लगी, तब उसे फिर से प्राणवंत करने का बीड़ा उठाया कुछ समर्पित महानुभावों ने
स्व. डॉ. अमर, चंद्रप्रकाश अवस्थी जी,
कांति मोहन गुप्ता जी,
मोतीलाल गुप्ता जी,
प्रमोद गुप्ता (रामू भैया)
और मन्नी लाल शाह जी के परिजन केदार बाबू
इन सभी ने मिलकर सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित किया।
जब दरभंगा मंडली से पुनः संपर्क साधा गया और असफलता मिली, तब मोतीलाल गुप्ता जी ने मथुरा-वृंदावन के शर्मा जी की मंडली से संवाद किया। यह मंडली दिन में श्रीकृष्ण लीला और रात्रि में रामलीला का भव्य मंचन करती थी। साकेत धाम की रामलीला ने पुनः अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा प्राप्त की।
इसी पुनरुत्थान के काल में, कांति मोहन गुप्ता जी के प्रयासों से एक कानपुर के प्रतिष्ठित व्यवसायी का सहयोग मिला, जिसकी बदौलत साकेत धाम में तीन भव्य प्रवेश द्वार और बाउंड्री वॉल का निर्माण हुआ। साथ ही, राजा गुप्ता नामक व्यक्ति ने आयोजन समिति से अनुमति लेकर वहाँ नुमाइश भी आयोजित की, जो कुछ वर्षों तक सफलतापूर्वक लगी।
समय के साथ, नई समितियों के अभाव में वह बाउंड्री वॉल और द्वार काल के गर्भ में खो गए। परंतु आज जब हम वर्तमान की ओर नज़र डालते हैं, तो हृदय गर्व से भर उठता है।
वर्तमान में साकेत धाम रामलीला को पुनः उसके स्वर्णिम स्वरूप की ओर ले जाने का कार्य किया है
अध्यक्ष श्री संजय राठी,
चंद्रप्रकाश अवस्थी
और उनकी कर्मठ टीम ने।
इनके अथक प्रयासों और निष्ठा के कारण ही आज साकेत धाम की रामलीला एक बार फिर जनमानस की श्रद्धा और गौरव का केंद्र बन गई है।
यह सिर्फ़ एक रामलीला नहीं, यह हमारी सांस्कृतिक चेतना की आत्मा है।
यह परंपरा, आस्था और समाज की एकजुटता का प्रतीक है।
यह उन्नाव की पहचान है।
आइए आज शाम को हम सभी लोग पहुंच कर इस पुनीत आयोजन के भागीदार बने।




