पूर्व सैनिक के पक्ष में हाईकोर्ट का फैसला, पत्नी की भरण-पोषण याचिका खारिज

0
40

अहमदाबाद। गुजरात हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पत्नी की भरण-पोषण की मांग को खारिज कर दिया है। अदालत ने नडियाद फैमिली कोर्ट के पूर्व आदेश को बरकरार रखते हुए पत्नी की क्रिमिनल रिवीजन याचिका भी खारिज कर दी।

मामले के अनुसार, पूर्व सैनिक और उनकी पत्नी का विवाह 3 मार्च 2006 को नडियाद में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। पति भारतीय सेना में सेवारत थे। पत्नी ने अदालत में आरोप लगाया था कि पति की गैरमौजूदगी में ससुराल पक्ष के लोग उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे तथा दहेज की मांग करते थे। महिला के मुताबिक, 25 मार्च 2010 को उसे घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

भरण-पोषण का पुराना आदेश फैमिली कोर्ट ने किया था रद्द

पत्नी ने पति से मासिक भरण-पोषण पाने के लिए CrPC की धारा 125 के तहत नडियाद की अदालत में याचिका दाखिल की थी। शुरुआत में 30 जनवरी 2015 को अदालत ने एकतरफा आदेश जारी करते हुए पति को हर महीने 10 हजार रुपये देने का निर्देश दिया था।

हालांकि, बाद में मामले की दोबारा सुनवाई के दौरान फैमिली कोर्ट ने 11 अक्टूबर 2017 को पत्नी की याचिका खारिज कर दी और पहले जारी किए गए भरण-पोषण के आदेश को भी रद्द कर दिया। इसी फैसले को पत्नी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

दहेज उत्पीड़न के मामले में ससुराल पक्ष के आरोपी बरी

वैवाहिक विवाद के दौरान महिला ने पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ IPC की धारा 498A तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत शिकायत भी दर्ज कराई थी। हालांकि, इस मामले में ससुराल पक्ष के आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया था।

फैमिली कोर्ट में पेश किए गए साक्ष्यों के अनुसार, महिला वर्ष 2008 से ही अपने मायके में रह रही थी। पति की जानकारी या सहमति के बिना गर्भपात कराने का तथ्य भी अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज था। इसके अलावा, पति के साथ रहने से इनकार करने के पीछे कोई उचित और पर्याप्त कारण साबित नहीं हो सका था।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से किया इनकार

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कानूनी प्रावधानों और निचली अदालत के निष्कर्षों की समीक्षा की। अदालत ने कहा कि बिना किसी उचित कारण के पति से अलग रहने वाली पत्नी को CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण पाने का अधिकार नहीं मिलता।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि क्रिमिनल रिवीजन के दौरान निचली अदालत द्वारा साक्ष्यों के आधार पर दिए गए फैसले में बिना ठोस आधार के हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

अंततः हाईकोर्ट ने नडियाद फैमिली कोर्ट के 11 अक्टूबर 2017 के आदेश को बरकरार रखते हुए पत्नी की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज कर दी।


LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here