उन्नाव।इस्लामी कैलेंडर के सबसे पवित्र महीने “रमज़ान-उल-मुबारक” का आगाज़ हो चुका है। दुनिया भर के मुसलमान इस महीने में रोज़ा (व्रत) रखकर अल्लाह की इबादत में मशगूल हैं। रमज़ान केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्म-शुद्धि, धैर्य और मानवता की सेवा का संदेश देता है।
कस्बा गंजमुरादाबाद में स्थित मशहूर दरगाह मौलाना फजले रहमाँ साहब की बड़ी मस्जिद के पेश इमाम मौलाना इब्राहिम अब्र ने बताया कि रमज़ान की सबसे बड़ी फजीलत यह है कि इसी महीने में अल्लाह ने इंसानियत के मार्गदर्शन के लिए पवित्र ‘कुरआन’ को ज़मीन पर उतारा था। इस महीने की एक रात, जिसे ‘शब-ए-कद्र’ कहा जाता है, हज़ारों महीनों की इबादत से बेहतर मानी जाती है। रमज़ान के महीने में जन्नत (स्वर्ग) के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और जहन्नुम (नरक) के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं। यह महीना तीन हिस्सों (अशरों) में बंटा होता है:-पहला अशरा (रहमत) अल्लाह की रहमत का। दूसरा अशरा (मगफिरत) गुनाहों की माफी का।
तीसरा अशरा (नजात) जहन्नुम की आग से आजादी का। रोज़ा रखने का मुख्य उद्देश्य ‘तक्वा’ (अल्लाह का डर और परहेजगारी) हासिल करना है। रोज़ेदार न केवल खाने-पीने से बचता है, बल्कि झूठ बोलना, बुराई करना और क्रोध करने जैसी आदतों से भी दूर रहता है। रमज़ान हमें गरीबों और ज़रूरतमंदों के दर्द का एहसास कराता है। इस महीने में ‘ज़कात’ (दान) देने का विशेष महत्व है। अपनी संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा दान करने से समाज में आर्थिक संतुलन बना रहता है। पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व.) के अनुसार, इस महीने में किए गए किसी भी नेक काम का सवाब (पुण्य) सत्तर गुना बढ़ा दिया जाता है। सूरज निकलने से पहले ‘सेहरी’ करना सुन्नत है, वहीं सूर्यास्त के समय ‘इफ्तार’ करना सुकुन और भाईचारे का प्रतीक है। मस्जिदों में होने वाली विशेष नमाज़ ‘तरावीह’ इस महीने की रूहानियत को और बढ़ा देती है। रमज़ान का महीना हमें सिखाता है कि हम अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण कैसे रखें और एक बेहतर इंसान कैसे बनें। यह महीना आपसी प्रेम, शांति और सद्भावना का पैगाम देता है।




