नई दिल्ली।देश की राजधानी दिल्ली से जुड़ा एक डरावना और चिंताजनक सच सामने आया है। बीते 10 वर्षों में दिल्ली से करीब 37 हजार नाबालिग लड़कियां लापता हो चुकी हैं। यह आंकड़ा न सिर्फ प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि समाज की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर चिंता पैदा करता है।
सरकारी रिकॉर्ड और विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार हर साल हजारों नाबालिग बच्चियां घर से गायब हो रही हैं, जिनमें से बड़ी संख्या आज तक वापस नहीं लौट सकी। सवाल यह है कि आखिर ये बच्चियां जा कहां रही हैं?
मानव तस्करी या संगठित अपराध?
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि लापता नाबालिगों का बड़ा हिस्सा मानव तस्करी,
बाल श्रम,देह व्यापार,जबरन शादी जैसे संगठित अपराधों का शिकार हो सकता है।हालांकि पुलिस कई मामलों में “बरामदगी” का दावा करती है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि हजारों केस अब भी अधूरे हैं।
सबसे ज्यादा संवेदनशील इलाके।
सूत्रों के अनुसार दिल्ली के बाहरी दिल्ली,उत्तर-पूर्वी जिले,झुग्गी-झोपड़ी और प्रवासी आबादी वाले इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, जहां आर्थिक कमजोरी और जागरूकता की कमी अपराधियों के लिए मौका बन जाती है।
प्रशासन पर उठे सवाल।
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि
FIR दर्ज करने में देरी,मामलों की धीमी जांच,राज्यों के बीच समन्वय की कमी,लापता बच्चियों की बरामदगी में सबसे बड़ी बाधा है।
समाज की भी जिम्मेदारी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ पुलिस ही नहीं, बल्कि
माता-पिता,स्कूल,स्थानीय समुदाय को भी सतर्क रहने की जरूरत है। किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को देना अनिवार्य है।
चौंकाने वाला सवाल
जब देश की राजधानी में बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं, तो “बेटी बचाओ” के नारे जमीनी हकीकत में कितने कारगर हैं?
नव हिन्दुस्तान पत्रिका इस मुद्दे को आगे भी प्रमुखता से उठाता रहेगा।




