उन्नाव।बांगरमऊ नगर निवासी प्रमुख समाजसेवी व अधिवक्ता तथा समाजवादी अधिवक्ता सभा के राष्ट्रीय महासचिव संजीव त्रिवेदी ने आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के हो रहे भारी शोषण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज के आधुनिक कार्यबल में ‘आउटसोर्सिंग’ (बाह्य स्रोत) एक प्रमुख स्तंभ बन चुका है, लेकिन इसके पीछे छिपा काला सच अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है।
देश के विभिन्न सरकारी विभागों और निजी संस्थानों में काम कर रहे लाखों आउटसोर्सिंग कर्मचारी आज ‘आधुनिक दासता’ और भारी आर्थिक शोषण का शिकार हो रहे हैं।
1. “कम वेतन और कमीशन का खेल”–आउटसोर्सिंग के नाम पर ठेकेदार (वेंडर) और कर्मचारियों के बीच एक बड़ा खेल चल रहा है। सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के बावजूद, ठेकेदार कर्मचारियों के वेतन में से एक बड़ा हिस्सा ‘कमीशन’ या ‘सर्विस चार्ज’ के नाम पर काट लेते हैं। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि कागजों पर पूरा वेतन दिखाया जाता है, लेकिन कर्मचारियों के हाथ में उसकी आधी रकम भी नहीं आती।
2. “सामाजिक सुरक्षा का अभाव”–
EPF (कर्मचारी भविष्य निधि) और ESIC (बीमा) जैसी बुनियादी सुविधाएं इन कर्मचारियों के लिए एक सपना बनी हुई हैं।
पीएफ कटौती:– कर्मचारियों के वेतन से पीएफ तो काट लिया जाता है, लेकिन वह उनके खातों में जमा नहीं होता।
“स्वास्थ्य लाभ”– दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में इन कर्मचारियों के पास कोई चिकित्सा बीमा नहीं होता, जिससे उनका पूरा परिवार कर्ज के दलदल में फंस जाता है।
3. “काम के घंटों की कोई सीमा नहीं”–नियमित कर्मचारियों की तुलना में आउटसोर्सिंग कर्मियों से दोगुना काम लिया जाता है। 8 घंटे की शिफ्ट अक्सर 10 से 12 घंटे तक खिंच जाती है, और अतिरिक्त समय (Overtime) के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता। विरोध करने पर सीधे ‘नौकरी से निकालने’ की धमकी दी जाती है।
4. “नौकरी की असुरक्षा और मानसिक तनाव”– इन कर्मचारियों के सिर पर हमेशा छंटनी की तलवार लटकी रहती है। ठेकेदार का टेंडर खत्म होते ही या ठेकेदार से अनबन होने पर कर्मचारियों को बिना किसी नोटिस के बाहर कर दिया जाता है। इस अनिश्चितता के कारण युवा कर्मचारी गंभीर मानसिक तनाव और अवसाद का शिकार हो रहे हैं।
5. “महिलाओं का दोहरा शोषण”–
महिला आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की स्थिति और भी दयनीय है। उन्हें न तो मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) मिलता है और न ही कार्यस्थल पर उचित सुरक्षा। कई मामलों में आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाकर उनके साथ अभद्र व्यवहार की खबरें भी सामने आती रही हैं। श्रम कानून विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत को सख्ती से लागू नहीं करती और ठेकेदारी प्रथा की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र निकाय नहीं बनाती, तब तक यह शोषण जारी रहेगा। आउटसोर्सिंग व्यवस्था जो कि लागत कम करने और दक्षता बढ़ाने के लिए शुरू की गई थी, आज शोषण का एक बड़ा अड्डा बन गई है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह देश की एक बड़ी कार्यबल आबादी को आर्थिक और सामाजिक रूप से पंगु बना देगी।




