उन्नाव। जिले का सफीपुर कस्बा गंगा-जमुनी तहजीब और सूफीवाद का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां के बुजुर्गों विशेष कर हजरत मखदूम शाह सफी र० अलै० व हजरत मखदूम शाह खादिम सफी र० अलै० की शिक्षाओं में हमेशा मानवता, प्रेम, रूहानियत (आध्यात्मिकता) को प्राथमिकता दी गई है।
सफीपुर शरीफ में चिश्तिया सिलसिले की मशहूर दरगाह खानकाह-ए- सफविया के साहबज़ादा वारिसे मसनदे शाहे सफी अल मारूफ हजरत अफजाल मोहम्मद फारूकी सफ़वी से हमारे संवाददाता द्वारा खानकाहों व सूफी संतों पर की गई खास बातचीत में उन्होंने बताया कि महान सूफी संत वो हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी रूहानियत, इंसानियत और अल्लाह की मोहब्बत में गुजार दी। उन्होंने बताया कि सूफी वो नहीं है जो केवल विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करें बल्कि सूफी वो है जिसका दिल आईने की तरह साफ हो। सूफी वो है जो अपनी इच्छाओं “नफ़्स” पर विजय प्राप्त कर ले और केवल अल्लाह की रज़ा के लिए जिए। सूफीवाद का सार अल्लाह से बेपनाह मोहब्बत है। जब बंदा अल्लाह के इश्क में डूब जाता है तो उसे पूरी कायनात में अल्लाह का ही नूर नज़र आता है। सूफी वही है जो अल्लाह की मखलूक (प्राणियो) से प्यार करे। इंसानों की सेवा करना अल्लाह को पाने का सबसे सरल रास्ता है।
एक सवाल का जवाब देते हुए हजरत अफज़ाल मोहम्मद फारूकी सफ़वी ने कहा कि बुजुर्ग वो होते हैं जो आम इंसानों और अल्लाह के बीच एक पुल का काम करते हैं, वे अपने मुरीदों के दिलों की सफाई करते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बुजुर्गों की बारगाह में “अदब” ही सब कुछ है, जिसने अदब खोया- उसने सब कुछ खो दिया। बुजुर्गों की मजार और उनकी सोहबत (संगति) रूहानी फैज (आध्यात्मिक लाभ) का जरिया होती हैं। उनकी दुआओं से बड़ी-बड़ी मुश्किलें हल हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि सफीपुर शरीफ सदियों से सूफीवाद का केंद्र रहा है। इन बुजुर्गों ने यहां रहकर न केवल इल्म (ज्ञान) बांटा, बल्कि लोगों को आपसी भाईचारे और शांति का संदेश दिया। “सूफी का रास्ता कांटो भरा है, लेकिन इसकी मंजिल अल्लाह का दीदार है।” उन्होंने कहा कि हमेशा सच बोलें और सादगी अपनाएँ। अपने दिल को नफरत और लालच से पाक (साफ) रखें। इबादत के साथ-साथ हुकूकुल इबाद (इंसानों के प्रति कर्तव्य) को भी पूरा करें। बुजुर्गों के बताए रास्ते पर चलकर ही इंसान कामिल (पूर्ण) बन सकता है। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि अल्लाह (ईश्वर) की इबादत अधूरी है यदि आप उसके बनाए हुए बंदों (इंसानों) की सेवा नहीं करते।
बुजुर्गों के साथ चर्चा में उन्होंने “नफ़्स” (अहंकार/ वासना) को मारने की बात कही, क्योंकि सूफी मत में खुदा तक पहुंचने का रास्ता खुद को मिटाने से शुरू होता है। उन्होंने बताया कि सूफी बुजुर्गों का जीवन यह दर्शाता है की असली आध्यात्म कर्मकाण्डों में नहीं बल्कि दिल की सफाई और दूसरों के प्रति करुणा में है। उर्स के दौरान सभी धर्म के लोग मिलकर दरगाह पर चादर चढ़ाते हैं। बुजुर्गों ने हमेशा यह सिखाया है कि “मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।” ये खानकाहें/दरगाह आज भी सूफी परंपराओं का पालन करते हुए समाज में शांति और भाईचारे का संदेश फैला रही हैं। इस वार्ता के मौके पर नगर पालिका परिषद बांगरमऊ के पूर्व अध्यक्ष इजहार खां “गुड्डू”, समाजसेवी फजलुर्रहमान, ज़मीर खान सहित कई लोग मौजूद रहे।
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